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नारी तुम केवल श्रद्धा नहीं हो!

नारी क्या तुम केवल श्रद्धा हो? नहीं! तुम तो भोग वाला प्रसाद हो, हाँ तुम! तुम नारीवाद के हाशिए पर खेली गई मटमैली होली हो, क्या तुम्हारा अस्तित्व 'कुटज' - सा कुरूप है? नहीं तुम तो कुकुरमुत्ते सी हो जो अनायास ही कहीं भी अपना प्रेम छलका देना चाहता है। तुम कभी जातिवाद सी अनसुलझी लगती हो; तो कभी हिमालय की आभा सी स्पष्ट, तो नारी तुम क्या हो? तुम मंदिर के अंदर विराजमान देवी हो या फिर मासिक धर्म की पापिन ! तुम महाभारत की द्रोपदी हो या  सन सत्तावन की कर्ता ! नारी तुम क्या हो? तुम त्याज्य हो या पूज्य? नहीं! तुम मात्र सेतु हो दो नई पीढ़ियों की, हाँ तुम वर्तमान की गंगा हो जिसका उत्थान कथनीय है शायद तुम आज कोर्ट-कचहरी में रखे धर्म ग्रंथों की तरह हो जिसे सिर्फ जाना जाता है माना नहीं, नारी तुम खगों की चहचहाहट भी हो और कोयल का रुदन भी नारी तुम खुला आकाश भी हो तो कभी समुद्र में तूफान से पहले की शांति भी हो नारी तुम्हारा अस्तित्व अनंत भी है और संकुचित भी  नारी तुम सब कुछ हो  बस! तुम केवल श्रद्धा नहीं हो। -तालिब हुसैन हिंदी विभाग जामिया मिल्...
                निर्भय कल उसने मुझे 'ज़िंदादिल' कह कर  पुकारा, ना जाने क्या वजह थी ऐसा कहने की? अक्सर लोग मेरे बाहरी आचरण को मेरा परिचय मान लेते हैं, पर ! दिल का धडकना ,  साँसों का चलना, पुतलियों का हिलना और मन का हलचल करना, इनका चलना मात्र  'ज़िंदगी '  चलना है, 'ज़िंदा  ' चलना नहीं वह मुख का तेज और कुछ करने का साहस तो राजनीतिक श्राप के गर्भ में जा विराजमान हैं, अब तो अक्सर डर लगता है कुछ यथार्थ लिखने में उस यथार्थ से पहले अपने परिवार के यथार्थ प्राणों का कलम की मौत का, देशनिकाला का , माना कि कलमकार हूँ मैं, पर वह कलम की तृष्णा, क्रोध, वो जिजीविषा मर सी गई है, इसलिए मात्र जीने की औपचारिकता निभा रहा  हूँ क्योंकि मैं 'ज़िंदगी ' में तो  हूँ, पर 'ज़िंदा ' नहीं... .. इस उम्मीद में, शायद आने वाली कलम निर्भय हो तालिब हुसैन 'रहबर' हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया
*दोज़खी* हाँ मैं दोज़खी हूँ! कई बार औरों के लिए ख़ुद से किये वादे तोड़े हैं; झूठ भी बोला है जब कोई पूछता है मेरा हाल; ठीक हूँ कह कर, किया है 'शिर्क' कई बार; जब ख़ुदा को लोगों के दिल में ढूंढ़ने की कोशिश की है। हाँ मैं दोज़खी हूँ! भले ही अपनी ख़्वाहिशों का; जज़्बातों का ही ; पर... क़त्ल तो किया है न। दुखाया है दिल; अपनो का ही, दूर हो कर, जब सिखाना चाहा सबक मुझे जात- बिरादरी का.. तोड़े हैं दिल दोस्तों के जब स्वार्थ के पैमाने में ; उन्होंने मुझे तोलना चाहा। हाँ मैं दोज़खी हूँ! छीनना चाहा है रोजगार अपनी जेब से पैसे न देकर, उनका जो रात को चंदे से मुर्ग-मुसल्लम खाते हैं ठुकराया है उस दर्द को, जिसमें औरों के लिए  दर्द शामिल न हो, तोड़नी चाही है वह परंपरा जो युगों-युगों से  चली  आ रही है जिसमें पति परमेश्वर होता है। ठुकराना चाहा है उन धर्म वचनों को जो मुझे फ़िरक़ों में बाँटते थे,            और किया है सवाल ...