*दोज़खी*
हाँ मैं दोज़खी हूँ!
कई बार
औरों के लिए ख़ुद से किये वादे तोड़े हैं;
झूठ भी बोला है
जब कोई पूछता है मेरा हाल; ठीक हूँ कह कर,
किया है 'शिर्क' कई बार;
जब ख़ुदा को लोगों के दिल में
ढूंढ़ने की कोशिश की है।
हाँ मैं दोज़खी हूँ!
भले ही अपनी ख़्वाहिशों का;
जज़्बातों का ही ;
पर...
क़त्ल तो किया है न।
दुखाया है दिल;
अपनो का ही,
दूर हो कर, जब सिखाना चाहा सबक मुझे
जात- बिरादरी का..
तोड़े हैं दिल
दोस्तों के
जब स्वार्थ के पैमाने में ; उन्होंने मुझे तोलना चाहा।
हाँ मैं दोज़खी हूँ!
छीनना चाहा है रोजगार
अपनी जेब से पैसे न देकर,
उनका जो रात को चंदे से
मुर्ग-मुसल्लम खाते हैं
ठुकराया है उस दर्द को,
जिसमें औरों के लिए
दर्द शामिल न हो,
तोड़नी चाही है वह परंपरा
जो युगों-युगों से
चली आ रही है
जिसमें
पति परमेश्वर होता है।
ठुकराना चाहा है उन धर्म वचनों को
जो मुझे फ़िरक़ों में बाँटते थे,
और
किया है सवाल उस परमेश्वर पर
जो मुझे बस
'इंसान' ही नहीं रहने देता
इसलिए ही तो कहता हूं
हाँ मैं दोज़खी हूँ!
-तालिब हुसैन
हिंदी विभाग
जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली
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