कलम व्यथा
ना जाने क्यों? मेरी कलम कुछ दिनों से खामोश सी है, न जाने क्यों उसकी ज्वाला शरद हवा हो गयी है? कहीं वो शब्द सागर से शब्दों के मोती लाना भूल तो नही गयी? कहीं वो गलत से आंख मिलाना भूल तो नही गयी? हो गयी कैसे स्तब्ध वो इस क्षणभंगुर परिवेश में? रक्त ठंडा हो गया कैसे उसका मौनी बाबा का भेष में? लगता है फिर उसे'जामवंत' बन जगाना होगा, उसकी शक्ति का उसे पुनः आभास कराना होगा, फिर कहीं शायद कलम रक्त आसुओं के न बहेगी, फिर कहीं शायद कलम अंगार के स्वर कह सकेगी, फिर कहीं इसके पुजारी देश हित मे गा सकेंगे. फिर कहीं ईद ओर दीवाली एक संग में आ सकेंगे. सब विचारों का है तमाशा जो आज दिल सहमे हुए हैं जानते सब हैं मगर अपने गले को रौंदे हुए हैं, है यही अभिलाषा एक दिन यह खुद को अपने जान लेगी, अपने कर्तव्यों को एक दिन फिर से यह पहचान लेगी, है कलम तो यह कलम के रक्त को एक दिन कहेगी, सूर्य संग आंखें मिला कर फिर से यह आगे बढ़ेगी, सूर्य संग आँखे मिला कर फिर से यह आगे बढ़ेगी..... -तालिब हुसैन हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली