गुरु की सार्थकता

     *गुरु  की सार्थकता*


गुरुब्रह्मा गुरुविष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः |

गुरुः साक्षात् पर ब्रह्म तस्मै श्री गुरुवे नमः ||


भावार्थ :- गुरु ब्रह्मा है ; गुरु विष्णु है ; गुरु ही शंकर ; गुरु ही साक्षात परब्रह्मा है ; उन सद्गुरु को परिणाम !


हिंदुस्तान में गुरु का दर्ज़ा ईश्वर से भी ऊँचा  माना गया है | महाभारत से लेकर आज तक गुरु वंदना होती आयी है | गुरु की महत्तवता  को  बताते हुए कबीर ने कहा है :-

गुरु गोविंद दोउ खड़े ,काके लागूं पांय ।

बलिहारी गुरु आपने गोविंद दियो बताय ।।

विद्यार्थी जीवन में विद्यार्थी के लिए जितना महत्व उसके माता-पिता का नहीं होता उतना उसके लिए 'गुरु' का होता है। महाभारत के द्रोणाचार्य-अर्जुन, निजामुद्दीन औलिया-अमीर खुसरो और चाणक्य और अशोक जैसे गुरु शिष्य संबंध के बारे में हम सभी जानते हैं। कहा जाता है गुरु  ऐसी कुंजी है जिसके द्वारा मनुष्य जीवन रूपी पथ का असल राही बन पाता है । गुरु और शिष्य का संबंध होता ही अतुल्य है । जीवन में गुरु का न होना ठीक वैसा ही है जैसे-  शरीर में प्राण का न होना ।  सूफी अमीर खुसरो ने अपने गुरु निजामुद्दीन औलिया के स्वर्गवास हो जाने पर अपने आपको 'बिन जल मछली' जैसा व्याकुल पाया था और कहा था -
" गोरी सोवे सेज पर मुख पर डारे केश ।
चल खुसरो घर आपने रैन भई चहुं देस ।।

जब इंसान को सही गुरु मिल जाता है तो अर्जुन,अमीर खुसरो अशोक और  महात्मा गांधी जैसी प्रभूतियाँ संसार को मिलती हैं। इसलिए गुरु की प्रसांगिकता आज भी समाज में है और अनंत तक बनी रहेगी किंतु सवाल यह है क्या अब  द्रोणाचार्य , निजामुद्दीन  औलिया , गुरु नानक , चाणक्य और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे गुरु पाए जाते हैं । 21वी सदी में विरले ही ऐसे गुरु पाए जा रहे हैं । कहा जाए तो असल गुरु विलुप्त होते जा रहे हैं । भारतीय परिप्रेक्ष्य की बात करें तो कहा जा सकता है कि इस युग की सबसे बड़ी चिंता की बात है "विद्यार्थी रूपी मानव संसाधन की गुणवत्ता में आई कमी" अर्थात विद्यार्थी स्नातक तो कर चुका होता है पर उसकी गुणवत्ता उतनी नहीं होती । पहले कहा जाता था कि हाई स्कूल पढ़कर टीचर बन जाते थे और आज स्नातक व स्नातकोत्तर हो कर भी बेरोजगार घूम रहे । तो क्या इसके पीछे उनका नसीब कसूरवार है ? कतई नहीं ! कसूरवार है तो उनकी गुणवत्ता की कमी।

कहा जाता है-

काकः कृष्णः पिक कृष्ण: को भेदो पिककाकयो: ।
वसंतमये   प्राप्ते    काकः काकः    पिक: पिक:।।

अर्थात

कौवा भी काला और कोयल भी काली है,  कौए और कोयल में क्या भेद है ?  किंतु जब बसंत आता है तो पता चलता है कौवा कौवा है कोयल कोयल । ठीक उसी तरह डिग्री तो सभी स्नातक करने वाले के पास होती है और सभी अपने आपको ग्रेजुएट कहते हैं किंतु जब वह पत्राचार करते हैं तो उनका व्यवहार बता देता है कि वह कितने गुणी हैं और कितने ज्ञानी है और इसका परिणाम है पढ़ा लिखा बेरोजगार घूमना । विश्वविद्यालय में कुर्सी पर जमे शिक्षक द्रोणाचार्य नहीं बन सकते और ना ही उन्हें मतलब कि जिस अंकुर को वह पौधा बनाने का कार्य कर रहे हैं और जब वह पौधा  नहीं बन पाता इसका कारण ; कमी उस पौधे में थी या फिर उनकी ही किसानी में कुछ गड़बड़ थी। उनका मतलब तो अपनी 8 घंटे की प्राप्त मोटी तनख्वाह से होता है । आज विद्यार्थी को शिक्षक अपने निजी कार्य में व्यस्त रखना चाहता हैं और विद्यार्थी भी सोचता है कि अब तो  शिक्षक से अच्छी जान पहचान हो गई है तो उनका जीवन सफल हो जाएगा क्योंकि विद्यार्थी को आज भी गुरु को  ब्रह्मा मानता है परंतु ऐसा बिल्कुल भी नहीं होता। जब शिक्षक कहता है - फलाँ विद्यार्थी मेरे बहुत करीब है तो समझ लीजिए आज से उसके उज्जवल भविष्य के साथ खिलवाड़ होगा क्योंकि अब विद्यार्थी भी अपने शिक्षक से आगे सोचने या बढ़ने की चेष्ठा ही नहीं करेगा ।  जो उसका सामर्थ्य था अब विद्यार्थी उसे भी शिक्षक पर निर्भर कर देगा । आज विद्यालयों से लेकर विश्वविद्यालयों  सभी में ऐसा होता देखा जा सकता है जहां विद्यार्थी अपने अध्ययन कार्य से अधिक समय शिक्षकों के कार्य में व्यतीत करता है। किसी विद्यार्थी को शिक्षक द्वारा प्रोत्साहित करना बहुत आवश्यक है यह विद्यार्थी को 'सर्वगुण संपन्न' बनाने में कार्य करता है। शिक्षक द्वारा विद्यार्थी की मदद करना शिक्षक का धर्म है और विद्यार्थी का भी अपने शिक्षक का आदर करना और उनकी कहीं बातों का पालन करना प्रत्येक विद्यार्थी का परम धर्म है। परंतु जब यह पत्राचार और व्यवहार के पीछे मात्र शिक्षक का स्वार्थ हो तो यह विद्यार्थी के भविष्य के लिए खतरा है । गुरु और शिष्य के मध्य एक दीवार का होना परम आवश्यक है क्योंकि जब यह दीवार टूट  जाती है तो दोनों अपने धर्म पथ से  अलग कार्य करने लगते हैं और इसका परिणाम वही विद्यार्थी रूपी मानव संसाधन की गुणवत्ता में कमी आना ।  आज विद्यार्थी विद्यालय से ज्यादा बाहर से सीखना  पसंद करता है क्योंकि आज अर्जुन की जगह एकलव्य सार्थक है क्योंकि आज के गुरु भी तथाकथित द्रोणाचार्य बन अर्जुन को ही खा सकते हैं एकलव्य को नहीं और अब एकलव्य भी अपना अंगूठा नहीं देना चाहता वरन वह शास्त्रार्थ करने में समर्थ है तो शास्त्रार्थ करना चाहता है । गुरु को अपने गुरु की भूमिका निभाते हुए अपने शिष्यों को शास्त्रार्थ के लिए तैयार करना होगा और अपने गुरु होने का,  अपने आप को ब्रह्मा कहलाने का प्रमाण देना होगा इसके लिए चाहिए कि मात्र विद्यार्थी को ही नहीं शिक्षक को भी आत्म चिंतन करने की आवश्यकता है और अपने आप को पहचानने की आवश्यकता है और उन्हें अपने कार्य को पहचानने की आवश्यकता है। विद्यार्थियों को निस्वार्थ भाव से शिक्षार्थ करने की आवश्यकता है। इससे एक तो  देश का विकास होगा और दूसरा विद्यार्थी रूपी मानव संसाधन की गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होगी । एक स्नातक किया हुआ विद्यार्थी अपने व्यवहार से भी स्नातक लगेगा । जब भारत शिक्षित होगा तो सभी दकियानूसी बंधनो को भी तोड़ने का साहस करेगा ।  जब विद्यार्थी गुणी होंगे तो उन्हें  रोजगार भी उन्हें उनकी काबिलियत पर मिलेगा । साथ ही साथ जो परिभाषा, जो मानदंड और जो रूपरेखा शिक्षक की पहले थी वही पुनः  स्थापित हो जाएगी और भारत फिर से ज्योति पुंज बन जाएगा।

       तालिब हुसैन
हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया, नई दिल्ली

Comments