निर्भय
कल उसने मुझे 'ज़िंदादिल' कह कर पुकारा,
ना जाने क्या वजह थी ऐसा कहने की?
अक्सर लोग मेरे बाहरी आचरण को
मेरा परिचय मान लेते हैं,
पर !
दिल का धडकना , साँसों का चलना,
पुतलियों का हिलना और मन का हलचल करना,
इनका चलना मात्र 'ज़िंदगी ' चलना है,
'ज़िंदा ' चलना नहीं
वह मुख का तेज और कुछ करने का साहस
तो
राजनीतिक श्राप के गर्भ में जा विराजमान हैं,
अब तो अक्सर डर लगता है
कुछ यथार्थ लिखने में
उस यथार्थ से पहले
अपने परिवार के यथार्थ प्राणों का
कलम की मौत का,
देशनिकाला का ,
माना कि कलमकार हूँ मैं,
पर वह कलम की तृष्णा,
क्रोध,
वो जिजीविषा
मर सी गई है,
इसलिए मात्र जीने की औपचारिकता
निभा रहा हूँ क्योंकि
मैं 'ज़िंदगी ' में तो हूँ,
पर 'ज़िंदा ' नहीं... ..
इस उम्मीद में,
शायद आने वाली कलम निर्भय हो
तालिब हुसैन 'रहबर'
हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया
कल उसने मुझे 'ज़िंदादिल' कह कर पुकारा,
ना जाने क्या वजह थी ऐसा कहने की?
अक्सर लोग मेरे बाहरी आचरण को
मेरा परिचय मान लेते हैं,
पर !
दिल का धडकना , साँसों का चलना,
पुतलियों का हिलना और मन का हलचल करना,
इनका चलना मात्र 'ज़िंदगी ' चलना है,
'ज़िंदा ' चलना नहीं
वह मुख का तेज और कुछ करने का साहस
तो
राजनीतिक श्राप के गर्भ में जा विराजमान हैं,
अब तो अक्सर डर लगता है
कुछ यथार्थ लिखने में
उस यथार्थ से पहले
अपने परिवार के यथार्थ प्राणों का
कलम की मौत का,
देशनिकाला का ,
माना कि कलमकार हूँ मैं,
पर वह कलम की तृष्णा,
क्रोध,
वो जिजीविषा
मर सी गई है,
इसलिए मात्र जीने की औपचारिकता
निभा रहा हूँ क्योंकि
मैं 'ज़िंदगी ' में तो हूँ,
पर 'ज़िंदा ' नहीं... ..
इस उम्मीद में,
शायद आने वाली कलम निर्भय हो
तालिब हुसैन 'रहबर'
हिंदी विभाग, जामिया मिल्लिया इस्लामिया
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